Tree Planation: नारी शक्ति की मिसाल: बसंती देवी ने महिलाओं को किया संगठित, इन उत्कृष्ट कार्यों के लिए मिलेगा पद्मश्री सम्मान

साल 2022 पद्म पुरस्कारों की सूची में महिलाओं को भी स्थाम मिला। इन महिलाओं ने अलग अलग क्षेत्रों में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है। कई महिलाएं तो ऐसी है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश और देश की संस्कृति, पर्यावरण व लोगों के लिए समर्पित कर दिया। एक तरह दोनों पैरों से न चल पाने वाली राबिया हैं, जो व्हील चेयर से लंबी दूरी का सफर तय कर लोगों को कभी न हार मानने की प्रेरणा दे रही हैं, तो दूसरी तरफ 102 साल की शकुंतला चौधरी हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन गांधी के आदर्शों, सिद्धांतों को लोगों तक पहुंचाने में लगा दिया। उत्कृष्ट कार्यों के जरिए पहचान बनाने वाली देश की इन्हीं नायिकाओं में एक नाम बसंती देवी का है। बसंती देवी को साल 2022 पद्मश्री पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। बसंती देवी उत्तराखंड से ताल्लुख रखती हैं। पर्यावरण को बचाने के लिए उनका प्रयास अतुलनीय है। इसके पहले भी बसंती देवी को देश का सर्वोच्च नारी शक्ति पुरस्कार मिल चुका है। जानिए पद्मश्री बसंती देवी के बारे में। 

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Tree Plantation : Business Idea

Tree Plantation : Business Idea:-

Business Idea: आ गया सदाबहार डिमांड वाला सुपरहिट बिजनेस, घर बैठे होगी करोड़ों रुपये की कमाई, जानिए कैसे करें शुरू

Business Idea: भारत में कुल काजू के उत्पादन का 25 फीसदी हिस्सा भारत में होता है। इसकी खेती केरल, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा में होती है

Business Idea: अगर आप कोई ऐसा बिजनेस करने की तलाश में हैं, जिसमें घाटा लगने के चांस कम हों और बंपर कमाई हो, तो हम आपको एक ऐसा बिजनेस आइडिया दे रहे है, जिसकी बाजार में जबरदस्त डिमांड है। यह एक ऐसा प्रोडक्ट है, जिसे, सर्दी, गर्मी बारिश हर मौसम में खाया जाता है। इसके अलावा इसे बच्चों से लेकर बूढ़े तक सभी बड़े चाव से खाते हैं। इतना ही नहीं इस प्रोडक्ट की डिमांड गांव से शहरों तक हमेशा जोरदार बनी रहती है।

हम बात कर रहे हैं काजू की खेती (Cashew Farming) के बारे में। देश में कुछ समय से खेती में कई तरह के बदलाव आए हैं। अब देश किसान पारंपरागत खेती छोड़कर नकदी फसल पर ज्यादा जोर दे रहे हैं। सरकार भी अपने स्तर से किसानों को लगातार जागरूक बना रही है। इसके पेड़ लगाकर किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं।

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Startup:डिप्रेशन से उबरने लिए पहल; मंदिरों में चढ़ने वाले फूलों से मूर्ति बना रहीं पूनम, 80 हजार महीने की कमाई

डिप्रेशन से उबरने लिए पहल; मंदिरों में चढ़ने वाले फूलों से मूर्ति बना रहीं पूनम, 80 हजार महीने की कमाई

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कई लोग बदलाव की बड़ी- बड़ी बातें तो करते हैं, लेकिन जब बात बदलाव करने की होती है तो सच्चाई कुछ और ही होती है। गुरुग्राम की पूनम उन चुनिंदा लोगों में से हैं, जो न सिर्फ बदलाव के बारे में सोचती हैं, बल्कि उन्होंने उसे साकार भी कर दिखाया है। अपनी खराब मेंटल स्थिति से उबरने के लिए पूनम हर रोज मंदिर जाती थीं। मंदिर में चढ़ने वाले फूलों को कचरे में फेंकते हुए देखा, तो उन्हें दुख हुआ।

उन्होंने इन फूलों से खास तरह के बिजनेस ‘आरुही इंटरप्राइजेज’ की शुरुआत की। जिसके जरिए वो फूलों से भगवान की मूर्ति, धूपबत्ती और दीपक समेत 15 इको फ्रेंडली होम डेकोर प्रोडक्ट्स तैयार करती हैं।

जिसे वो स्टाॅल, मेला, ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया के जरिए पूरे देश में सेल कर रही हैं। पूनम करीब 10 महिलाओं को रोजगार दे रही हैं, और हर महीने करीब 80 हजार रुपए भी कमा रही हैं। फूलों को इकट्ठा करने के लिए पूनम कई मंदिरों के साथ जुड़ी हैं। वह कई शहरों की महिलाओं को बेकार फूलों को रीसाइकल करने की ट्रेनिंग भी दे रही हैं।

आज की पॉजिटिव खबर में जानते हैं पूनम की हाउसवाइफ से सोशल इन्फ्लुएंसर बनने की कहानी ….

फूलों को कचरे में देख काफी तकलीफ हुई

पूनम सहरावत गुरुग्राम की रहने वाली हैं। उनके पति का खुद का कारोबार है और उनके दो बच्चे सार्थक और सक्षम सहरावत हैं।

पूनम सहरावत गुरुग्राम की रहने वाली हैं। उनके पति का खुद का कारोबार है और उनके दो बच्चे सार्थक और सक्षम सहरावत हैं।

38 साल की पूनम सहरावत गुरुग्राम की रहने वाली हैं। पूनम की शादी 18 साल की उम्र में हो गई थी। तब से मानो जैसे बच्चे और परिवार ही पूरी दुनिया हो। पूरा समय उनके लिए दिया। तीन साल पहले पूनम के दोनों बच्चे बोर्डिंग स्कूल पढ़ने चले गए, जिसके बाद वह काफी अकेली हो गईं। इन दिनों किसी कारण वो धीरे-धीरे डिप्रेशन की चपेट में आने लगीं।

पूनम बताती हैं, “डिप्रेशन से उबरने के लिए मैं रेगुलर मंदिर जाने लगी। मुझे वहां सुकून मिलता था तो मैं घंटों बैठी रहती थी। एक दिन मेरा ध्यान मंदिर में चढ़ने वालों फूलों पर गया। मैंने देखा भगवान पर चढ़ने वाले फूल बाद में कचरे में फेंके जा रहे थे। मुझे उस दिन ये देख कर बहुत दुःख हुआ। मैं घर आ कर काफी रिसर्च की तो मुझे पता चला कि गोबर और पराली से कई प्रोडक्ट्स बनते हैं। इस पर मैंने सोचा क्यों न फूलों से भी कुछ बनाया जाए। सबसे पहले मैंने धूपबत्ती बनाई और मंदिरों में ही जाकर बांट दी। इस तरह मेरा सफर शुरू हुआ।”

एक्सपीरिएंस बिना शुरुआत मुश्किल भरी थी

पूनम ने सबसे पहले फूलों से धूपबत्ती बनाना सीखी, जिसे मंदिरों में जाकर बांटती थीं।

पूनम ने सबसे पहले फूलों से धूपबत्ती बनाना सीखी, जिसे मंदिरों में जाकर बांटती थीं।

वर्क एक्सपीरियंस न होने के कारण पूनम को इस काम में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। रिसर्च के दौरान उन्हें एक ग्रुप के बारे में पता चला जो मंदिर में चढ़े फूलों से अगरबत्ती बना रहे हैं। पूनम ने उन लोगों से जानकारी लेने की कोशिश की पर उन्हें कोई मदद नहीं मिली।

पूनम कहती हैं, “जब मैं इन फूलों के बेहतर इस्तेमाल की खोज में लगी थी, तभी मुझे कुछ लोगों के बारे में पता चला जो गाय के गोबर से सामान बना रहे थे। उनसे प्रेरित होकर मैंने गोबर की जगह बेकार फूलों को अपनाने का फैसला किया। फिर ढेरों एक्सपेरिमेंट के बाद मुझे फाइनल तरीका पता लगा।

अब मुझे फूलों की जरूरत थी, जिसके लिए मैंने मंदिरों के पुजारियों से बात करना शुरू किया। हर रोज सुबह उठकर मंदिरों से निकले फूलों को जमा करना शुरू कर दिया। इसके लिए पुजारियों से भी बात की, लेकिन उन्हें ये काम संभव ही नहीं लग रहा था। किसी तरह मैं एक दोस्त की मदद से इस काम की शुरुआत कर दी। हमने 10 महिलाओं की एक टीम बनाई और सबसे पहले धूपबत्ती बनाई। जिसे आसपास के मंदिरों में जा कर बांटा। ये देख पुजारी भी काफी अचंभित हुए और ये हमारी पहली जीत थी।”

पूनम फिलहाल 12 से 15 मंदिरों से जुड़ी हैं जहां से हर रोज फूल इक्कठा कर कई तरह के प्रोडक्ट तैयार करती हैं।

ऐसे तैयार किए जाते हैं

पूनम फूलों से दीपक, मूर्ति, धूपबत्ती, स्वास्तिक, एयर फ्रेशनर आदि बनाती हैं।

पूनम फूलों से दीपक, मूर्ति, धूपबत्ती, स्वास्तिक, एयर फ्रेशनर आदि बनाती हैं।

भारत मंदिरों का देश है, यहां हर गली- मोहल्ले में एक मंदिर है। इन मंदिरों में काफी फूल चढ़ाए जाते हैं। जो एक बार चढ़ाए जाने के बाद कहीं कचरे या नदी-नालों में फेंक दिए जाते हैं। पूनम इन फूलों को मंदिरों से उठाकर कुछ प्रोसेस कर खूबसूरत प्रोडक्ट्स तैयार करती हैं।

पूनम बताती हैं, “ सबसे पहले हम फूलों को सुखाते हैं उसके बाद मशीन की मदद से पाउडर बना लेते हैं। पाउडर में कुछ इंग्रेडिएंट्स मिलाकर उसे अलग-अलग शेप में मोल्ड किया जाता है। उसके बाद फिर से उन्हें धूप में सुखाया जाता है। इस प्रोसेस से हम दीपक, मूर्ति, धूपबत्ती, स्वास्तिक, एयर फ्रेशनर और कई तरह के होम डेकोर बनाते हैं। इसके अलावा माता की इस्तेमाल चुनरी से पाउच भी बनाया जाता है। हम किसी तरह प्लास्टिक के इस्तेमाल से बचते हैं। सबसे खास बात ये है की हमारे ज्यादातर प्रोडक्ट इको फ्रेंडली हैं, जिन्हें बाद में पौधों के लिए खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।”

पूनम के सभी प्रोडक्ट काफी किफायती होते हैं, जो 50 रुपए से लेकर 120 रुपए के बीच के हैं। उन्हें हर महीने करीब 80 हजार रुपए की कमाई होती है।

प्रोडक्ट्स कैसे सेल होते हैं?

इ-कॉमर्स और सोशल मीडिया की मदद से अपने प्रोडक्ट की बिक्री करती हैं।

इ-कॉमर्स और सोशल मीडिया की मदद से अपने प्रोडक्ट की बिक्री करती हैं।

पूनम ने जब मंदिरों से फूल इकट्ठा करना शुरू किया तो लोगों की नजर में उनकी अलग ही छवि बन गई। लोग भी उन्हें मदद करने के लिए आगे आने लगे। गुरुग्राम के श्री माता शीतला देवी मंदिर में उन्हें प्रोडक्ट बेचने का प्रस्ताव मिला।

पूनम बताती हैं, ‘सबसे पहले हमने स्टॉल लागर प्रोडक्ट्स की बिक्री की। फिर लोगों को हमारे बारे में पता चलने लगा तो हमें कई जगह बुलाया जाने लगा। आने वाले 10 फरवरी को हमें पुडुचेरी के ‘हुनर हाट’ में अपना स्टॉल लगाने के लिए बुलाया गया है। इसके अलावा हम स्वदेश मेला और इंटरनेशनल ट्रेड फेयर में भी हिस्सा लेते हैं। ऑनलाइन सेलिंग के लिए इ-कॉमर्स और सोशल मीडिया की मदद लेते हैं।’ पूनम ने अपने प्रोडक्ट्स के लिए खुद का वेब पेज बनाया है इसके अलावा वो अमेजन और इंस्टाग्राम से भी बिक्री करती हैं।

नेशनल वीमेन कमीशन ने इन्फ्लुएंसर का खिताब दिया है

अब तक वो हजारों महिलाओं को ऑनलाइन और ऑफलाइन ट्रेनिंग दे चुकी हैं। जिनमें से 500 से अधिक महिलाएं जम्मू-कश्मीर की हैं।

अब तक वो हजारों महिलाओं को ऑनलाइन और ऑफलाइन ट्रेनिंग दे चुकी हैं। जिनमें से 500 से अधिक महिलाएं जम्मू-कश्मीर की हैं।

पूनम के अनुसार इस बिजनेस का मकसद पैसा कमाना नहीं, बल्कि बदलाव में अपनी भागीदारी निभाना है। यही वजह कि वो कई शहरों में महिलाओं को ट्रेनिंग दे रही हैं ताकि वो जहां रहती हैं, वहां इस तरह का काम कर सकें।

पूनम का कहना है, ‘भारत में जितने मंदिर हैं ,उतने ही भक्त। ऐसे में किसी एक इंसान से बदलाव नहीं लाया जा सकता। फूलों का कचरे में जाना कहीं न कहीं हमारी आस्था को भी ठेस पहुंचता है। इसका विकल्प यही है कि हम इससे कुछ अच्छे प्रोडक्ट बना लें। इससे न सिर्फ फूल सही जगह जाएंगे, बल्कि इनसे ऑर्गेनिक प्रोडक्ट भी तैयार होंगे।

जो धूपबत्ती हम बनाते हैं, उनमें किसी तरह के केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता है। जिन मूर्तियों को हम तैयार करते हैं, उनको प्रवाहित करने से प्रदूषण भी नहीं होता है। इसी सोच के साथ मैं कई कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जाकर लोगों को ट्रेनिंग देती हूं।’

पूनम जम्मू एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, थल सेना और राष्ट्रीय महिला आयोग के साथ भी जुड़ी हुई हैं। अब तक वो हजारों महिलाओं को ऑनलाइन और ऑफलाइन ट्रेनिंग दे चुकी हैं। जिनमें से 500 से अधिक महिलाएं जम्मू कश्मीर की हैं। पूनम को उनके इस बेहतर काम के लिए कई अवॉर्ड और सराहना भी मिला है। हाल ही में नेशनल कमीशन वूमेन ने उन्हें इनफ्लुएंसर का खिताब दिया है।

Startup: कोरोना में अपने पैशन को प्रोफेशन में बदला; इंस्टाग्राम से मार्केटिंग शुरू की, अब 10 लाख टर्नओवर

कोरोना में अपने पैशन को प्रोफेशन में बदला; इंस्टाग्राम से मार्केटिंग शुरू की, अब 10 लाख टर्नओवर

Startup – Art and Craft.

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जम्मू कश्मीर की रहने वाली नितिका गुप्ता पाइन कोन की फाउंडर हैं। वे इंस्टाग्राम के जरिए वॉल बास्केट, लॉन्ड्री बास्केट, प्लांटर बास्केट सहित कई हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट की देशभर में मार्केटिंग कर रही हैं। उनके साथ जम्मू-कश्मीर, असम, हिमाचल और मणिपुर के 200 से ज्यादा कारीगर जुड़े हैं। कई बड़े ब्रांड्स के साथ भी उनका टाइअप है। महज एक साल में उन्होंने अपने स्टार्टअप के जरिए 10 लाख रुपए का बिजनेस किया है। साथ ही बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार भी दिया है।

तो चलिए आज की पॉजिटिव खबर में पढ़िए नितिका के सफर कहानी खुद नितिका की जुबानी….

मैं जम्मू-कश्मीर में पली बढ़ी। वहां के कल्चर और फैशन से जुड़ी रही। बचपन से ही क्रिएटिव चीजें बनाने का शौक था। अलग-अलग तरह की चीजें बनाकर अपने घर को सजाती थी। 12वीं बाद जब मेरे फ्रेंड्स मेडिकल और इंजीनियरिंग फील्ड में करियर को लेकर प्लान कर रहे थे, तब भी मेरे दिमाग में मेरा पैशन ही था। मुझे नहीं पता था कि आगे यह प्रोफेशन बनेगा या नहीं, लेकिन जो कुछ करना चाहती थी, अपनी पसंद का ही करना चाहती थी। लिहाजा गांधीनगर चली गई और NIFT में एडमिशन लिया।

यहां अच्छे लोग मिले, कई तरह की चीजों को करीब से देखने को मिला। अलग-अलग राज्यों के आर्ट एंड क्राफ्ट से जुड़े लोगों से मिलने का मौका मिला। जैसे मणिपुर के कारीगरों से मिली, वहां के लोकल प्रोडक्ट को देखा, हिमाचल और असम के कारीगरों के आर्ट को देखा। धीरे-धीरे मैं उनसे जुड़ती गई। कुछ वक्त बाद मैं इस तरह के ट्रेडिशनल आर्ट को नए तरह से डिजाइन करने की प्लानिंग करने लगी, जो वक्त के हिसाब से डिमांडिंग और क्रिएटिव हो।

NIFT से पढ़ाई करने के बाद मैंने 12 साल तक अलग-अलग कंपनियों में काम किया। प्रोडक्ट डिजाइनिंग से लेकर प्रोडक्ट मैनेजमेंट की टीम को लीड किया।

NIFT से पढ़ाई करने के बाद मैंने 12 साल तक अलग-अलग कंपनियों में काम किया। प्रोडक्ट डिजाइनिंग से लेकर प्रोडक्ट मैनेजमेंट की टीम को लीड किया।

इसके बाद प्रोडक्ट डिजाइनिंग को लेकर मैंने कई प्रोजेक्ट किए। कई राज्यों में वर्कशॉप और एग्जीबिशन में गई। इससे प्रोफेशनल लेवल पर आर्ट एंड क्राफ्ट को समझने का मौका मिला। इस तरह नई-नई चीजें सीखते-सीखते कब चार साल गुजर गए पता ही नहीं चला। खैर 2009 में मेरा ग्रेजुएशन पूरा हो गया। अब बारी थी करियर को आगे बढ़ाने की। जल्द ही मुझे मन मुताबिक नौकरी भी मिल गई। 2009 में प्रोडक्ट डिजाइनर के रूप में काम करना शुरू किया।

इसके बाद अलग-अलग शहरों में कई बड़े ब्रांड्स के साथ काम किया। जहां मैंने प्रोडक्ट डिजाइनर से लेकर प्रोडक्ट मैनेजमेंट और ब्रांड मैनेजमेंट तक की जिम्मेदारी संभाली, लेकिन वक्त के साथ नौकरी को लेकर मेरी दिलचस्पी कम होती जा रही थी। रोज-रोज सुबह उठकर तैयार होना और ऑफिस जाना, फिर दफ्तर से लौटते ही घर का काम करना और सो जाना। इस रूटीन लाइफ से मन उब गया था।

तब मैं जम्मू-कश्मीर के साथ ही असम और मणिपुर के कारीगरों से जुड़ी थी। उनसे अक्सर बातचीत करती रहती थी। इस दौरान मुझे रियलाइज हुआ कि इन कलाकारों के काम को जितनी जगह मिलनी चाहिए, जितना कारगर प्लेटफॉर्म मिलना चाहिए, वो नहीं मिल पा रहा है। इसी वजह से हुनर होने के बाद भी इनकी अच्छी कमाई नहीं हो पा रही है और ये तंगहाल जिंदगी जी रहे हैं।

चूंकि मैं अपनी नौकरी में काफी व्यस्त रहती थी, लेकिन इन कारीगरों के बारे में प्लान करती रहती थी। अक्सर सोचती रहती थी कि इनके काम को कैसे पहचान दिलाई जाए, कैसे इनकी लाइफ बेहतर की जाए। कुछ महीनों तक ऐसा ही चलता रहा। घर से ऑफिस और फिर ऑफिस से घर।

हम ट्रेडिशनल आर्ट को ही नए सिरे से डिजाइन करके हैंडीक्राफ्ट आइटम्स तैयार कर रहे हैं, ताकि लोकल कारीगरों के काम को ग्लोबल पहचान मिल सके।

हम ट्रेडिशनल आर्ट को ही नए सिरे से डिजाइन करके हैंडीक्राफ्ट आइटम्स तैयार कर रहे हैं, ताकि लोकल कारीगरों के काम को ग्लोबल पहचान मिल सके।

इसी बीच नई उम्मीदों के साथ साल 2020 की दस्तक हुई। मन में कई चीजों को लेकर प्लानिंग थी। उसमें खुद का कुछ करने का भी प्लान था, लेकिन थोड़े दिनों बाद ही कोरोना ने दस्तक दे दी। मार्च में लॉकडाउन लग गया। एक तरह से सबकुछ ठप हो गया। इससे ज्यादातर लोगों को तकलीफ हुई। मुझे भी परेशानी झेलनी पड़ी, वर्क कल्चर चेंज हो गया, ऑफिस की बजाय घर ही दफ्तर हो गया, लेकिन इसका फायदा भी हुआ।

वर्क फ्रॉम होम के दौरान कुछ सोचने का वक्त मिल गया। अपनी पसंद की चीजों को लेकर प्लानिंग करने का वक्त मिल गया। ये वो दौर था जब स्थानीय कारीगरों पर कोरोना की सबसे ज्यादा मार पड़ी थी। उनका काम-धंधा बंद हो गया था। मुझे लगा कि यह सही वक्त है अपने पैशन को प्रोफेशन में बदलने का।

अगर अभी फैसला नहीं ले पाई तो आगे शायद कुछ अलग करने का प्लान करना मुमकिन नहीं होगा। फिर क्या था फौरन कुछ कारीगरों को फोन घुमाया और अपनी इच्छा उनसे जाहिर कर दी। वे भी खाली बैठे थे, उन्हें भी कुछ न कुछ चाहिए था। लिहाजा उन्होंने साथ काम करने की रजामंदी दे दी।

इसके बाद मैंने कुछ प्रोटोटाइप तैयार किए और उन्हें अलग-अलग राज्यों के कारीगरों के पास भेजा। उन्होंने उसके आधार पर कुछ होम डेकोर आइटम्स तैयार किए और फिर मेरे यहां भेजे। ये आइटम्स बेहद ही खूबसूरत थे। अब सवाल था कि इनकी मार्केटिंग कैसे की जाए। तभी मुझे ध्यान आया कि लोग इंस्टाग्राम पर इस तरह के प्रोडक्ट की तलाश करते रहते हैं। फिर इंस्टाग्राम पर Pine Cone नाम से एक पेज बनाया और उस पर अपने प्रोडक्ट की फोटो अपलोड कर दी। शुरुआत के कुछ दिनों तक तो कोई खास रिस्पॉन्स नहीं आया।

ये सभी हैंडमेड प्रोडक्ट हैं। पिछले कुछ सालों में इनकी डिमांड बढ़ी है। लोग अपने घरों को सजाने के लिए ऐसे प्रोडक्ट खरीद रहे हैं।

ये सभी हैंडमेड प्रोडक्ट हैं। पिछले कुछ सालों में इनकी डिमांड बढ़ी है। लोग अपने घरों को सजाने के लिए ऐसे प्रोडक्ट खरीद रहे हैं।

फिर मैंने डिजिटल मार्केटिंग की हेल्प ली और अपने पेज को प्रमोट करना शुरू किया। पेड ऐड रन किए। इसका फायदा भी मिला और लोग हमारे प्रोडक्ट की डिमांड करने लगे। इस तरह दिसंबर 2020 में मेरा पैशन प्रोफेशन में बदल गया। जैसे-जैसे लोग ऑर्डर करते गए, मैं अपने काम का दायरा बढ़ाते गई। अब बारी थी कंपनी रजिस्टर करने की। अपने CA दोस्त से कॉन्टैक्ट किया और 15 दिन के भीतर कंपनी रजिस्टर हो गई। इसके बाद दिल्ली में एक ऑफिस खोला। इसमें करीब 1.5 लाख रुपए खर्च हो गए। हालांकि ये पैसे कुछ ही महीने में रिटर्न बैक भी हो गए।

साल 2021 के अप्रैल-मई तक मेरे काम को अच्छी खासी पहचान मिल गई। दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार सहित कई राज्यों से ऑर्डर मिलने लगे। इसके बाद जब कोरोना कम हुआ तो मैं मणिपुर, असम और हिमाचल में गई। वहां के करीगरों से मिली, उन्हें बेहतर प्रोडक्ट बनाने की ट्रेनिंग दी। धीरे-धीरे मेरे साथ काम करने वाले कारीगरों की संख्या भी बढ़ती गई। अभी कोविड की वजह से ग्राउंड पर नहीं जा पा रही हूं तो ऑनलाइन ही कारीगरों को ट्रेनिंग देती हूं।

फिलहाल मेरे साथ करीब 200 कारीगर काम करते हैं। खास बात यह है कि इनमें से ज्यादातर महिलाएं हैं। ये वो महिलाएं हैं जो पहले बहुत मुश्किल से खुद का गुजारा करती थीं, लेकिन अब इनकी अच्छी खासी आमदनी हो जाती थी।

ये असम की महिलाएं हैं, जो जलकुंभी कलेक्ट कर रही है। इसे सुखाने के बाद ये महिलाएं कई तरह के हैंडीक्राफ्ट आइटम्स बनाती हैं।

ये असम की महिलाएं हैं, जो जलकुंभी कलेक्ट कर रही है। इसे सुखाने के बाद ये महिलाएं कई तरह के हैंडीक्राफ्ट आइटम्स बनाती हैं।

अभी मेरे पास असम,हिमाचल, मणिपुर और जम्मू-कश्मीर से एक दर्जन से ज्यादा वैराइटी प्रोडक्ट हैं। इनमें वॉल बास्केट, लॉन्ड्री बास्केट, प्लांटर बास्केट जैसे प्रोडक्ट शामिल हैं। ये सभी प्रोडक्ट मेड टू ऑर्डर होते हैं। यानी कस्टमर जिस तरह के प्रोडक्ट की डिमांड करते हैं, उनके हिसाब से मैं प्रोडक्ट तैयार करवा के भेजती हूं। मेरे प्रोडक्ट की खासियत यह है कि हम ट्रेडिशनल आर्ट को मॉडर्न और क्रिएटिव लुक देते हैं। ताकि कस्टमर्स के घर की खूबसूरती बढ़ जाए।

ये काम सिर्फ बिजनेस नहीं है। मेरा मकसद भी है। इसीलिए मैं अपने एक-एक कारीगर को जानती हूं, उनकी खूबियों को जानती हूं। इतना ही नहीं मैं अपने ज्यादातर कस्टमर्स को भी उनके नाम से जानती हूं। कई कस्टमर्स तो इस कदर मुझसे जुड़ गए हैं कि वे हर महीने कुछ न कुछ प्रोडक्ट मंगाते रहते हैं।

जहां तक मार्केटिंग की बात है मैं पूरी तरह सोशल मीडिया के जरिए ही अपने प्रोडक्ट बेच रही हूं। हर महीने अच्छी खासी संख्या में ऑर्डर आ जाते हैं। पिछले एक साल के दौरान करीब 10 लाख रुपए का बिजनेस किया है। इसके साथ ही कई बड़े ब्रांड्स भी मेरे साथ जुड़े हैं, जिनके लिए मेरी टीम खास तौर से प्रोडक्ट बनाती है। आने वाले दिनों में और भी नए प्रोडक्ट मैं लॉन्च करने वाली हूं।

Reduce Reuse Recycle : ‘जीरो वेस्ट’ स्टोर रिटेल बिजनेस में अगला बड़ा कदम होने जा रहे हैं, लोगों को अपनी कुछ सहूलियतें छोड़ने के लिए तैयार होना चाहिए

‘जीरो वेस्ट’ स्टोर रिटेल बिजनेस में अगला बड़ा कदम होने जा रहे हैं, लोगों को अपनी कुछ सहूलियतें छोड़ने के लिए तैयार होना चाहिए

कुछ महीनों पहले जब महाराष्ट्र सरकार प्लास्टिक इस्तेमाल को लेकर कड़े कानून लाई थी, तो नासिक में जहां से मैं दूध लेता हूं, उसने मुझे अपना दूध का बर्तन (डोलची) लाने को कहा। जब भी मैं नासिक में सैर पर जाता, तो डोलची साथ ले जाता और स्टोर पर रख देता और सैर खत्म करके लौटते हुए उसमें दूध ले आता। जब भी मैं पानी डालकर वो डिब्बा धोता, तो संतुष्टि मिलती कि दूध की एक भी बूंद बर्बाद नहीं की और अगर वन टाइम यूज प्लास्टिक थैली लाता, तो वैसे भी बर्बादी होती।

ये अलग बात है कि जब मैं डोलची लेकर चलता हूं, तो मेरी बेटी अजीब-सा मुंह बनाती है, पर मुझे कभी शर्म नहीं आती क्योंकि मैं बचपन में वैसी ही डोलची लेकर दुकान से खाद्य तेल लेने जाता था। पर मेरी अगली पीढ़ी ने इस तरह से स्टोर-मॉल्स में नहीं देखा और उन्हें ये असहज लगता है। पर जब मैंने उसे समझाया कि कैसे प्लास्टिक इस्तेमाल घटा सकते हैं, तो ये सुनकर उसे अच्छा लगा। तबसे मैं ऐसा स्टोर खोज रहा था, जहां शैंपू, तेल, बाथरूम साफ करने का मटेरियल, वॉशिंग लिक्विड जैसे सारे सामान तो हों, पर उसे खरीदने के लिए अपना कंटेनर लाना पड़े।

पर मुझे कहीं नहीं मिला। मेरी खोज बेंगलुरु के जेपी नगर स्थित भारत के पहले जीरो वेस्ट ऑर्गेनिक स्टोर ‘अद्रीश’ पर जाकर खत्म हुई। यहां तक कि उनकी छत समेत बाकी इंटीरियर भी डलिया में इस्तेमाल सींक से बना है और सारे उत्पाद स्टील या टीन के ढक्कन वाले कांच के जार में रखे हैं। वे परचून का सामान, फल-सब्जी, पारंपरिक किचन सामान, साफ-सफाई की चीजें, होम केयर, पर्सनल केयर, पूजा-पाठ, हस्तशिल्प, वस्त्र आदि श्रेणी में 650 से ज्यादा उत्पाद बेचते हैं। यहां सारे उत्पाद प्राकृतिक और परंपरागत तरीके से परिष्कृत हैं।

वे खेती के लिए पूरी तरह ‘देसी’ बीज बेचते हैं। नीम के तने का इस्तेमाल करके सारे उत्पाद प्राकृतिक तरीके से सुरक्षित रखते हैं और अनाज को नियमित रूप से धूप में सुखाते हैं। रोचक बात ये है कि इसे इंदौर की लड़की मनाली सराफ ने शुरू किया है, जिसने रतलाम के रहने वाले लड़के से शादी की और फिर दोनों ये स्टोर खोलने के लिए बेंगलुरु गए। मनाली कहती हैं, ‘हम भारत में जीरो वेस्ट ऑर्गेनिक जीवन शुरू करने वालों में अग्रणी हैं और हमेशा एक ऐसा स्टोर शुरू करना चाहते थे जिसमें कुछ भी प्लास्टिक ना हो।’

उन्हें ये कहने में गर्व महसूस होता है कि उनका स्टोर प्रतिदिन 20 हजार प्लास्टिक थैलियां कचरे के ढेर में जाने से बचाता है। ‘अद्रीश’ में रसोई का डिब्बा ला सकते हैं या कम से कम सामान लेना हो, तो कागज के बैग में ले सकते हैं। वे पूरे बेंगलुुरु में बिना प्लास्टिक पैकिंग के सामान पहुंचाते हैं, साथ ही ग्राहकों के घरों तक सामान रीफिल भी कराते हैं। हममें से कई लोगों ने देखा होगा कि ‘रोजमर्रा के उत्पाद’ प्लास्टिक में आते हैं, जैसे साफ सब्जियों से लेकर, बर्तन की साबुन तक, तब भी उसमें थोड़ा-सा प्लास्टिक ही दोबारा इस्तेमाल हो पाता है।

उस प्लास्टिक को रीसाइकल डिब्बे में फेंकते हुए हम सोचते हैं कि धरती बचा ली। पर यकीन करें अमेरिका तक में, जहां दुनिया का सबसे ज्यादा प्लास्टिक उपभोग हैै, वहां ऐसे प्लास्टिक का सिर्फ 8.7% ही रिसाइकल हो पाता है। प्लास्टिक वेस्ट कम करने के इच्छुक लोगों को मैं सलाह दूंगा कि एक क्षेत्र से शुरू करें, जैसे शैंपू की खाली बोतल लाएं और इन्हें रीफिल करने वाले स्टोर से भराएं।

ये बोतल सालों चल सकती है। एक समय में एक कदम उठाएं। ये रातों-रात होने वाला कोई बदलाव नहीं है। फंडा यह है कि ‘जीरो वेस्ट’ स्टोर रिटेल बिजनेस में अगला बड़ा कदम होने जा रहे हैं, अगर छोटे से योगदान से धरती बचती है, तो लोगों को अपनी कुछ सहूलियतें छोड़ने के लिए तैयार होना चाहिए।

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Tree plantation :मंदिरों से मिलने वाले कोकोनट शेल से डेकोरेटिव सामान बनाते हैं दिव्यांग सब्यसाची; देशभर में मार्केटिंग (Reduce Reuse Recycle)

मंदिरों से मिलने वाले कोकोनट शेल से डेकोरेटिव सामान बनाते हैं दिव्यांग सब्यसाची; देशभर में मार्केटिंग

मंदिर में भगवान को नारियल चढ़ाने के बाद अकसर नारियल शेल को कहीं न कहीं फेक दिया जाता है। नारियल का शेल कचरे में फेंके जाने के बजाए इससे कुछ जरूरत की चीज बनाने के लिए ओडिशा के सब्यसाची पटेल ने एक पहल की। सब्यसाची वेस्ट कोकोनट शेल से काफी खूबसूरत डेकोरेशन का सामान बनाते हैं। इस सामान को ई-कॉमर्स कंपनियों के जरिए देश के कई हिस्सों में बेचा जाता है।

सब्यसाची दिव्यांग हैं जिन्हें कला से बहुत प्यार है। बचपन से ही इन्हें आर्ट में काफी रूचि रही है। लेकिन नौकरी और पढ़ाई की वजह से इन्हें कभी आर्ट को समय देने का मौका नहीं मिला। एक तरफ कोरोना ने कई लोगों को रुलाया है वहीं दूसरी तरफ कई लोगों के लिए ये एक मौका था खुद को खोजने , समझने और निखारने का। कोरोना दौर में ही सब्यसाची ने नारियल के शेल से कुछ क्रिएटिव बनाने पर हाथ आजमाया और वो कामयाब भी रहे। वे नारियल के वेस्ट शेल से चाय का कप, गिलास, रथ, शिवलिंग, स्कूटर और शिप सहित 18 -20 तरह के हैंडमेड प्रोडक्ट बनाते हैं। जिसमें किसी तरह की मशीन या केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता। सब्यसाची के काम को शुरू हुए 6 महीने ही हुए है लेकिन इनके प्रोडक्ट की डिमांड कई जगह से आ रही है।

आज की पॉजिटिव खबर में जानेंगे हैं सब्यसाची की कहानी जिन्होंने शारीरिक तकलीफ और कई चुनौतियों के बावजूद कला को अपना पेशा बनाया और कई लोगों को उनका काम बहुत पसंद भी आ रहा है…

बच्चों के प्रोजेक्ट से आइडिया आया

सब्यसाची नारियल के वेस्ट शेल से 18 -20 तरह के हैंडमेड प्रोडक्ट बनाते हैं। जिसमें किसी तरह की मशीन या केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता।

सब्यसाची नारियल के वेस्ट शेल से 18 -20 तरह के हैंडमेड प्रोडक्ट बनाते हैं। जिसमें किसी तरह की मशीन या केमिकल का इस्तेमाल नहीं होता।

29 साल के सब्यसाची पटेल ओडिशा के बलांगीर जिले के पुइंतला गांव के रहने वाले हैं। वो बचपन से दिव्यांग हैं। रीढ़ की हड्डी में दिक्कत होने के कारण ज्यादा समय तक खड़े नहीं रह सकते हैं और ना हीं ठीक से चल पाते हैं। बचपन से इन्हें आर्ट एंड क्राफ्ट में काफी रूचि थी लेकिन कभी सीखने का मौका नहीं मिला। लॉकडाउन ने उन्हें एक बेहतर मौका दिया जिसमें उन्होंने अपने हुनर को तराशा।

सब्यसाची बताते हैं, “आर्ट का शौक मुझे बहुत पहले से था और मैंने पहले थर्माकोल, फल-सब्जियों में कार्विंग का काम किया था। लॉकडाउन में मेरी भांजी को एक प्रोजेक्ट मिला था जिसमें साबुन पर कार्विंग कर कुछ नया तैयार करना था। उसी का प्रोजेक्ट बनाने के दौरान मुझे नारियल के शेल पर कार्विंग करने का आइडिया आया।”

सब्यसाची ने इस साल लॉकडाउन में यूट्यूब के जरिए नारियल वेस्ट शेल से डेकोरेशन का सामान बनाना सीखें। पहले इस काम को उन्होंने शौक के तौर पर आजमाया और अब उनका शौक उनका बिजनेस बन गया है।

शारीरिक तकलीफ के कारण नौकरी छोड़नी पड़ी

स्पाइन में तकलीफ के कारण सब्यसाची बहुत देर तक खड़े नहीं हो सकते न थे देर तक चल सकते हैं।

स्पाइन में तकलीफ के कारण सब्यसाची बहुत देर तक खड़े नहीं हो सकते न थे देर तक चल सकते हैं।

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Tree Plantation – नौकरी छोड़ खेती में बनाया करियर; अच्छी कमाई के साथ किसानों की जिंदगी संवार रहे

नौकरी छोड़ खेती में बनाया करियर; अच्छी कमाई के साथ किसानों की जिंदगी संवार रहे

एक संतुष्ट जीवन एक सफल जीवन से बेहतर है, ये कहना है झारखंड के राकेश का। जिन्होंने इंजीनियरिंग और मनैजमेंट की पढ़ाई के बाद लाखों की सैलरी वाली नौकरी के बजाय खेती को अपना करियर बनाया। गांव वालों की आजीविका को बेहतर बनाने, किसानों को मॉडर्न खेती से अवगत कराने और खेती को ऑर्गनाइज्ड सेक्टर बनाने के मकसद से राकेश ने ‘ब्रुक एन बीस’ नाम से अपने स्टार्टअप की शुरुआत की।

राकेश की इस अनोखी पहल के कारण आज तकरीबन 80 लोकल किसान उनके साथ जुड़ कर 50 एकड़ की जमीन पर कम्युनिटी-ऑर्गेनिक फार्मिंग कर रहे हैं। कम्युनिटी फार्मिंग में जुड़नेवाले कुछ किसानों को हर महीने 8000 रूपए सैलरी मिलती है और कुछ किसान जिनके पास जमीन है उन्हें प्रॉफिट का 10% मिलता है। किसानों और गांव वालों की मदद के अलावा ‘ब्रुक एन बीस’ से राकेश खुद 10-12 लाख सालाना कमा रहे हैं।

आज की पॉजिटिव स्टोरी में जानते हैं राकेश की इंजीनियर से किसान बनाने की कहानी …..

भारत भ्रमण के बाद आइडिया आया

ऐसी जिंदगी चुनने पर राकेश का कहना है की मैं एक ऐसी जिंदगी चाहता था जिसमें मुझे सफलता से ज्यादा सुकून मिले जो आज मुझे इस काम में मिल रही है

ऐसी जिंदगी चुनने पर राकेश का कहना है की मैं एक ऐसी जिंदगी चाहता था जिसमें मुझे सफलता से ज्यादा सुकून मिले जो आज मुझे इस काम में मिल रही है

32 साल के राकेश महंती, झारखंड के जमशेदपुर के पटमदा के रहने वाले हैं। 2012 में इंजीनियरिंग की पढ़ाई बैंगलोर इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से करने के बाद TCS कोलकाता में 4 साल तक नौकरी की। जहां वो हर महीने 1.5 लाख कमा रहे थे उसके बाद उन्होंने जेवियर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट जमशेदपुर से आगे की पढ़ाई की।

दैनिक भास्कर से बात करते हुए राकेश बताते हैं, “पढ़ाई के बाद मैं भारत भ्रमण पर गया जो मेरी जिंदगी का सबसे ज्यादा सीखने वाला समय था। मैंने देश के कई रंग, कल्चर, लोग और उनके जीने के तरीके के बारे जाना। इसी दौरान में देश के दो तरह के किसानों से मिला। एक तरफ पंजाब-हरियाण के किसान हैं जो काफी समृद्ध हैं, वहीं दूसरी तरफ छत्तसीगढ़ और झारखंड के किसान ऐसे हैं जो बहुत मेहनत के बावजूद खेती से अपनी आजीविका नहीं चला पाते हैं। इस वजह से कई किसान खेती छोड़ दूसरी जगह जा कर मजदूरी करने को मजबूर हो जाते हैं। खेती एक ऐसा सेक्टर है जिसमें कोई अपना करियर भी नहीं बनाना चाहता तो यहां बदलाव भी कैसे आएगा ये सो मैंने इससे अपना करियर बनाया”।

खेती और किसानों की जिंदगी को बेहतर बनाने और एक अनोखे उद्देश्य के साथ जीवन जीने के लिए राकेश ने ब्रुक एन बीस की शुरुआत की।

एक बीघा जमीन पर 5 किसानों के साथ से शुरुआत की

राकेश फिलहाल 80 किसानों के साथ 50 एकड़ की जमीन पर नेचुरल रिसोर्सेज की मदद से मिक्स्ड फार्मिंग कर रहे हैं इसके अलावा उन्होंने खेतों की 25 एकड़ मेड़ पर 3000 पेड़ भी लगाए

राकेश फिलहाल 80 किसानों के साथ 50 एकड़ की जमीन पर नेचुरल रिसोर्सेज की मदद से मिक्स्ड फार्मिंग कर रहे हैं इसके अलावा उन्होंने खेतों की 25 एकड़ मेड़ पर 3000 पेड़ भी लगाए

2018 में राकेश ने मैनेजमेंट की पढ़ाई के बाद ब्रुक एन बीस की शुरुआत अपने गांव पटमदा से की। जिसके लिए उन्होंने अपने साथ 5 किसानों को भी जोड़ा। फार्मिंग के लिए राकेश ने ट्रैडिशनल तरीके के बजाय ऑर्गेनिक तरीका चुना। इसके अलावा उन्होंने फसलों का चयन मौसम के अनुसार किया।

राकेश बताते हैं, “मैं गांव में ही पला बढ़ा हूं इसलिए मुझे खेती के बारे में बहुत कुछ मालूम था। ज्यादातर किसानों की फसल इसलिए खराब हो जाती है क्योंकि वो मौसम के अनुसार खेती नहीं करते। मैंने अपने पहले प्रोजेक्ट में इन बातों का ही ध्यान दिया। मौसम के अनुसार लोकल फसलों की खेती करने का प्लान किया। इस वजह से पहले सीजन में ही हमने काफी मुनाफा कमाया। धीरे-धीरे हमसे कई किसान जुड़ने लगे और हम बड़ी जमीनों पर खेती करने लगे।”

राकेश नेचर के अनुकूल और सामाजिक रूप से समावेशी खेती में विश्वास रखते हैं। फिलहाल वो 80 किसानों के साथ 50 एकड़ की जमीन पर कम्यूनिटी फार्मिंग कर रहे हैं। इनके स्टार्टअप में दो तरह के किसान जुड़े हैं। एक वो जिनके पास जमीन नहीं हैं, यानी भूमिहीन और दूसरे जिनके पास जमीन है। भूमिहीन किसानों को हर महीने 8000 सैलरी मिलती है, जबकि जमीन वाले किसान प्रॉफिट पर काम करते हैं।

ऑर्गेनिक फार्मिंग पर फोकस किया

कई किसान जो किसानी छोड़ दूसरे शहरों में मजदूरी करने को मजबूर थे वो वापस खेती की तरफ लौट आए हैं और बेहतर जिंदगी जी रहे हैं

कई किसान जो किसानी छोड़ दूसरे शहरों में मजदूरी करने को मजबूर थे वो वापस खेती की तरफ लौट आए हैं और बेहतर जिंदगी जी रहे हैं

2019 में राकेश ने अपने फॅमिली और लोकल किसानों से पूरी जानकारी प्राप्त करने के पूरी तरह से फार्मिंग को अपना करियर बनाया। उन्होंने खुद की 20 एकड़ जमीन पर ऑर्गेनिक बेस्ड मिक्स्ड फार्मिंग करना शुरू किया। अच्छी फसल के लिए राकेश देश के अलग अलग जगहों से बेहतर बीज मंगाए और उसके लिए गोबर, क्रॉप वेस्ट और केंचुओं से वर्मी कंपोस्टिंग तैयार किया। सबसे पहले टमाटर, ब्रोकोली, तोरी जैसी 30 तरह की सब्जियों के पौधे लगाए। साथ ही कई और किसानों को खुद के साथ जोड़ा।

https://www.bhaskar.com/db-original/news/rakesh-of-jharkhand-left-the-job-of-lakhs-and-started-farming-related-startup-live-the-life-of-farmers-with-good-income-129172560.html

15 गर्ल्स ने की निशुल्क टाइगर सफारी:रणथम्भौर के जोन-3 में टाइगर को देखा, वन और वन्यजीवों के बारे में ली जानकारी

15 गर्ल्स ने की निशुल्क टाइगर सफारी:रणथम्भौर के जोन-3 में टाइगर को देखा, वन और वन्यजीवों के बारे में ली जानकारी

https://www.bhaskar.com/local/rajasthan/jaipur/sawai-madhopur/news/under-our-lado-campaign-the-daughters-of-kustala-girls-school-took-information-about-free-tiger-safari-forest-and-wildlife-129158939.html

जिला प्रशासन की ओर से चलाए जा रहे हमारी लाडो अभियान के तहत शनिवार को गर्ल्स स्कूल कुस्तला की बेटियों ने रणथम्भौर नेशनल पार्क में टाइगर सफारी का आनन्द लिया। कलेक्टर के निर्देश पर कुस्तला गर्ल्स स्कूल की बेटियों के दल को रणथम्भौर नेशनल पार्क का भ्रमण करवाया गया।

जिला प्रशासन की ओर से हमारी लाडो अभियान के तहत शनिवार को सरकारी स्कूल बेटियों को रणथम्भौर नेशनल पार्क में निशुल्क टाइगर सफारी कराई जाती है। इसी कड़ी में शनिवार को रणथम्भौर में कुस्तला गर्ल्स स्कूल की बेटियों के 15 सदस्यीय एक दल ने सुबह की पारी में टाइगर सफारी की। इस दौरान कुस्तला गर्ल्स स्कूल की बेटियों ने रणथम्भौर के जंगल की सुन्दरता को निहारा और जंगल में वन्यजीवों को स्वछंद विचरण करते हुए देखा।

लेक एरिया में टाइगर की साइटिंग।

लेक एरिया में टाइगर की साइटिंग।

कुस्तला गर्ल्स स्कूल की बेटियों ने रणथम्भौर के जोन नम्बर 3 में मगरमच्छ, सांभर, चीतल, जंगली सुअर को जंगल में घूमते देखा। इस दौरान बेटियों ने जोन नम्बर तीन में लेक एरिया में टाइगर को देखा। बेटियों ने इस दौरान काफी समय तक टाइगर को अठखेलियां करते निहारा और टाइगर का स्वच्छंद विचरण देख कर बेटियों बडी खुशी मिली। टाइगर सफारी के दौरान बेटियों गाइड ने वन एवं वन्य जीवों के बारे में जानकारी भी दी।

Startup: पुणे के उमेश ठेले पर सब्जियां बेचते थे, आमदनी नहीं हुई तो होम डिलीवरी शुरू की; अब 2.5 करोड़ टर्नओवर

पुणे के उमेश ठेले पर सब्जियां बेचते थे, आमदनी नहीं हुई तो होम डिलीवरी शुरू की; अब 2.5 करोड़ टर्नओवर

महाराष्ट्र के पुणे के रहने वाले उमेश देवकर मैकेनिकल इंजीनियर हैं। सेल्स मार्केटिंग से लेकर चारा बेचने तक का उन्होंने काम किया। इसके बाद वे फार्मिंग सेक्टर में आ गए। पिछले 4 साल से वे फार्म टु होम नाम से खुद का स्टार्टअप चला रहे हैं। वे फल, सब्जियां और डेयरी प्रोडक्ट सीधे अपने फार्म हाउस से कस्टमर्स के घर पहुंचाते हैं। हर दिन उनके पास 250 से ज्यादा ऑर्डर्स आते हैं। सालाना 2.5 करोड़ रुपए उनका टर्नओवर है। इसके साथ ही सैकड़ों लोगों को उन्होंने रोजगार से भी जोड़ा है।

45 साल के उमेश एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। साल 1999 में इंजीनियरिंग करने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि अच्छी नौकरी मिलेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई जगह कोशिश करने के बाद भी उन्हें इंजीनियरिंग फील्ड में नौकरी नहीं मिली। इसके बाद बड़ी मशक्कत से उन्हें एक कंपनी में सेल्समैन की जॉब मिली। यहां दिनभर काम करने के बाद उन्हें 3500 रुपए महीने की सैलरी मिलती थी। इससे घर परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था।

नौकरी के दौरान मिला स्टार्टअप का आइडिया

45 साल के उमेश किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। नौकरी के साथ-साथ वे खेती से भी जुड़े थे।

45 साल के उमेश किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। नौकरी के साथ-साथ वे खेती से भी जुड़े थे।

इसके बाद उमेश ने नौकरी बदल ली। वे ट्रांसपोर्ट के फील्ड में काम करने लगे। यहां भी सैलरी कुछ खास नहीं थी, लेकिन उनके लिए इस फील्ड में काम करना टर्निंग पॉइंट रहा। उमेश को यह बात समझ में आ गई कि एक जगह से दूसरी जगह चीजों को कैसे ले जाते हैं और उनकी कीमत कैसे बढ़ जाती है।

उमेश कहते हैं कि नौकरी करने के दौरान मैंने देखा कि कैसे बिचौलिए किसानों के प्रोडक्ट की कीमतें अपने मनमर्जी से बढ़ा देते हैं। जो किसान फसल उगाता है, वह खुद उसकी कीमत नहीं तय कर पाता है। ऊपर से खेत से मंडियों तक प्रोडक्ट पहुंचाने में उसे अच्छी खासी कीमत चुकानी पड़ती है। इसी वजह से खेती में किसान को मुनाफा नहीं होता है। उमेश को लगा कि इसे बदलने की जरूरत है।

चूंकि उमेश किसान परिवार से ताल्लुक रखते थे, इसलिए नौकरी के साथ वे थोड़ी बहुत खेती भी करते थे। साल 2017 में महाराष्ट्र सरकार ने एक बदलाव किया था। इसके विरोध में आढ़तियों ने हड़ताल कर दी थी और शहर के लोगों को फल और सब्जियां नहीं मिल पा रही थीं। उमेश ने इस मौके का फायदा उठाया और भांडुप में एक सोसाइटी के बाहर अपना ठेला लगा दिया और सब्जियां बेचने लगे। देखते ही देखते कुछ ही घण्टों में उनकी पूरी सब्जियां बिक गईं और उन्हें अच्छा खासा मुनाफा मिला। इसके बाद खेती को ही उन्होंने करियर बना लिया।

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https://www.bhaskar.com/db-original/news/umesh-of-pune-used-to-sell-vegetables-on-handcart-started-home-delivery-if-there-was-no-income-now-25-crore-turnover-annually-129104049.html